चट्टान
मैं एक चट्टान हूँ, दूर - बहुत दूर क्षितिज तक फैले सागर के एक सिरे पर स्थित मैं एक चट्टान हूँ। मेरे सामने विस्तृत सागर की लहरें मेरे पास आती हैं मुझे छूती हैं, चूमती हैं और चली जाती हैं। लेकिन, मैं न तो उन्हें रोकता हूँ न ही कोशिश करता हूँ उन्हें अपने में समाहित करने की रेत के उन घरौंदों की तरह जो उनके क्षणिक प्रेम पे पड़कर अपना अस्तित्व नष्ट कर लेते हैं ... और मैं अपना अस्तित्व नष्ट नहीं करना चाहता, क्यों की, मैं एक चट्टान हूँ..... - दीपक 28 - Jul - 1999