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मुझे तुम मिल गयी...

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कदम बढ़ाऊ या खड़ा रहूँ  स्थिर, अविचल  जैसे खड़ा हूँ एक लम्बे समय से  एक अन्तर्द्वंद सा चल रहा था मन में। सैकड़ों प्रश्न विचर रहे थे मस्तिष्क में  एक छोर से दुसरे छोर तक अनुत्तरित से.  क्या चल सकता हूँ मैं , क्या आगे बढ़ सकता हूँ मैं गहरी शंका थी, संकोच था एक कमजोर हो चुके मन में. याद आया फिर, माँ का आश्वासन - 'बेटा सब ठीक है, अच्छा होगा',  मित्रों से मिलती प्रेरणा, बल; 'डरो मत, निकलो, आगे बढ़ो'  निश्चय किया, विश्वास किया और एक कदम आगे बढाया. अचानक जैसे धुंध छटने लगी, रोशनी सी फ़ैल गयी मेरे आस पास  और उस रोशनी में पहली बार दिखाई दी 'तुम'. एक सरल छवि, मुस्कुराता चेहरा मद्धम, चपल, बोलती सी आँखें और उन आँखों के पीछे छुपी चंचलता, उन्मुक्तता, स्नेह, सरलता. छोटी से नाक, उसपे चमकता लौंग कुछ कहने को आतुर अधखुले होठ उनके पीछे मोतियों से दांतों की झांकती हुई लड़ी मैं देख रहा था तुम्हें, प्रतीक्षारत था के तुम कुछ बोलो तुम्हारे होठ हिले और एक खनकती सी आवाज़ आई 'पहले कुछ खाने को मंगाइए, भूख लगी है...' और, मुझे तुम मिल गयी...  हृदय के तार स्पंदित हुए संवेदनाए जागृ...

पकौड़े

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समय एवं स्थान - 80 का दशक,  गोरखपुर    मेरी मौसी का घर ज्यादा दूर नहीं है तो अक्सर बचपन में वहां जाता था। बहुत सारी यादें जुडी हैं वहां से। निजी सड़क, जो एक खूब बड़े से लोहे के गेट को जाती थी, गेट के अन्दर दोनों तरफ पेड़, फूल, और भी कई तरह के पौधे। बड़ा सा अहाता, शिव जी का मंदिर, चरखी लगा हुआ कुवां और आखिरी में एक बड़ी सी कच्ची हवेली और साथ लगा हुआ एक पक्का मकान, अंग्रेजी तरीके से बना हुआ। कुछ अलग सा लगाव था मुझे उस माहौल से जो हमेशा अपनी तरफ खींचता था। ये बात तब की हैं जब मैं ३-४ साल का था और मौसी के घर गया था, कुछ धुंधली सी यादें हैं बाकि माँ और मौसी बताती हैं। बचपन में मैं खाने पीने का बहुत शौक़ीन था। एक दिन सुबह सुबह मौसी रसोई में पकौड़े तल रही थीं, माँ उनकी मदद कर रही थी। मौसा जी से मिलने अक्सर सरकारी लोग आते रहते थे, तहसील से, थाने से। मैं एक खाली प्लेट लेके मौसी के पास गया और बोला "मौसी पकौड़े दो, बाहर सिपाही को खिलाना है ", मौसी ने सोचा थाने से कोई सिपाही आये होंगे और मौसा जी ने बोला होगा लाने को, उन्होंने प्लेट में पकौड़े दे दिए। थोड़ी देर बाद मैं फिर आया खाल...