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पकौड़े

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समय एवं स्थान - 80 का दशक,  गोरखपुर    मेरी मौसी का घर ज्यादा दूर नहीं है तो अक्सर बचपन में वहां जाता था। बहुत सारी यादें जुडी हैं वहां से। निजी सड़क, जो एक खूब बड़े से लोहे के गेट को जाती थी, गेट के अन्दर दोनों तरफ पेड़, फूल, और भी कई तरह के पौधे। बड़ा सा अहाता, शिव जी का मंदिर, चरखी लगा हुआ कुवां और आखिरी में एक बड़ी सी कच्ची हवेली और साथ लगा हुआ एक पक्का मकान, अंग्रेजी तरीके से बना हुआ। कुछ अलग सा लगाव था मुझे उस माहौल से जो हमेशा अपनी तरफ खींचता था। ये बात तब की हैं जब मैं ३-४ साल का था और मौसी के घर गया था, कुछ धुंधली सी यादें हैं बाकि माँ और मौसी बताती हैं। बचपन में मैं खाने पीने का बहुत शौक़ीन था। एक दिन सुबह सुबह मौसी रसोई में पकौड़े तल रही थीं, माँ उनकी मदद कर रही थी। मौसा जी से मिलने अक्सर सरकारी लोग आते रहते थे, तहसील से, थाने से। मैं एक खाली प्लेट लेके मौसी के पास गया और बोला "मौसी पकौड़े दो, बाहर सिपाही को खिलाना है ", मौसी ने सोचा थाने से कोई सिपाही आये होंगे और मौसा जी ने बोला होगा लाने को, उन्होंने प्लेट में पकौड़े दे दिए। थोड़ी देर बाद मैं फिर आया खाल...