संदेश

2014 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

टिकुली (बिंदी)

चित्र
समय एवं स्थान - 80 का दशक, गोरखपुर   घर के अहाते में नीम के पेड़ के नीचे गिरे हुए पत्ते और उनसे खेलते लाल वाले चींटों को बड़े ध्यान से देख रहा था की तभी माँ ने खाने के लिए आवाज़ लगाई । बाहर वाला नलका बहुत टाइट था, मेरे से दबता भी नहीं था ठीक से, पूरा झूल गया हैंडिल से तब जाके हाथ धोने भर पानी निकला, अपनी हॉफ पैंट में हाथ पोंछता आँगन में भागा। दीवाली के बाद वाला मौसम, जाड़ा पड़ना अभी ठीक से शुरू नहीं हुआ था लेकिन सुबह शाम ठंड लगती थी, ऊपर से रसोई भी खुले आँगन में थी तो खाना खाते समय और ठंड महसूस होती थी, इसीलिए सब लोग चूल्हे के पास ही बैठना चाहते थे। पापा अपना पीढ़ा पहले ही चूल्हे के पास जमाए हुए थे और मम्मी तवे पे गरम गरम रोटिया बना उनकी थाली में परोस रही थीं। बड़ी सी थाली में दाल और आलू के चोखे के साथ पापा मजे से रोटियां खा रहे थे, दाल और चोखा मिल न जाए और रोटियां दाल में गीली ना हो जाएं इसलिए पापा ने थाली के निचे एक ईंट का छोटा टुकड़ा रख के एक तरफ से ऊँचा कर रखा था, उनको ऐसे ही अच्छा लगता था खाने में, सब कुछ एक थाली में परोस के।...