टिकुली (बिंदी)

समय एवं स्थान - 80 का दशक, गोरखपुर  

घर के अहाते में नीम के पेड़ के नीचे गिरे हुए पत्ते और उनसे खेलते लाल वाले चींटों को बड़े ध्यान से देख रहा था की तभी माँ ने खाने के लिए आवाज़ लगाई । बाहर वाला नलका बहुत टाइट था, मेरे से दबता भी नहीं था ठीक से, पूरा झूल गया हैंडिल से तब जाके हाथ धोने भर पानी निकला, अपनी हॉफ पैंट में हाथ पोंछता आँगन में भागा।

दीवाली के बाद वाला मौसम, जाड़ा पड़ना अभी ठीक से शुरू नहीं हुआ था लेकिन सुबह शाम ठंड लगती थी, ऊपर से रसोई भी खुले आँगन में थी तो खाना खाते समय और ठंड महसूस होती थी, इसीलिए सब लोग चूल्हे के पास ही बैठना चाहते थे। पापा अपना पीढ़ा पहले ही चूल्हे के पास जमाए हुए थे और मम्मी तवे पे गरम गरम रोटिया बना उनकी थाली में परोस रही थीं। बड़ी सी थाली में दाल और आलू के चोखे के साथ पापा मजे से रोटियां खा रहे थे, दाल और चोखा मिल न जाए और रोटियां दाल में गीली ना हो जाएं इसलिए पापा ने थाली के निचे एक ईंट का छोटा टुकड़ा रख के एक तरफ से ऊँचा कर रखा था, उनको ऐसे ही अच्छा लगता था खाने में, सब कुछ एक थाली में परोस के।

मम्मी रोज की तरह पूजा के बाद सीधे रसोई में भिड़ गयीं थीं। बाल खुले हुए, आधे गीले जो अब चूल्हे के गर्मी से सुख रहे थे, मांग में सिन्दूर की मोटी रेखा, पर ये क्या, माथा क्यों सूना था, आज मम्मी ने टिकुली (बिंदी) क्यों नहीं लगाई थी? सवाल को दरकिनार करके मैंने अपना ध्यान खाने पे लगाया। कटोरी में सादी दाल देख कर ही मेरा मन ख़राब होने लगता, मेरी शकल देख कर मम्मी ने चुपचाप भरवां मिर्चे के आचार का एक टुकड़ा मेरी दाल की कटोरी में डाल दिया। रोटी, चावल और दाल-चोखा खा कर मैं फिरसे मटरगश्ती करने निकल गया।

थोड़ी देर बाद फिर से घर के अंदर आया तो मम्मी सूपा में सरसो फटक रही थीं, सूपे से फटकने पे अनाज का ऊपर उड़ना, फिर वापस से सूपे से टकराने और मम्मी के हाथों की थाप से मिल कर एक धुन सी बन जाती है जो मुझे बहुत पसंद थी , चुपचाप बैठा देखता रहा। अचानक से फिर माँ के माथे पे नजर पड़ी तो पूछा "मम्मी, बिंदी क्यूँ नहीं लगायी हो?"। "लगाए थे लेकिन गिर गया। चपक नहीं रहा है, लासा खत्म हो गया है ना।  कहे तो हैं एक पत्ता नया टिकुली लाने के लिए तुम्हारे पापा से, देखो कब तक मिलता है । ", मम्मी ने जवाब दिया। वैसे तो मम्मी भोजपुरी बोलती थीं लेकिन मुझसे हिंदी में बात करती थीं।

टिकुली और लासा का सम्बंध बहुत गहरा था उन दिनों। लगता था जैसे प्लास्टिक और सीसे को मिला कर कुछ नया मटेरियल तैयार किया जाता था बिंदी बनाने के लिए। कागज पे हीरोइनों के फोटो के साथ छोटी, बड़ी, गोल, लंबी रंगबिरंगी बिंदियाँ; या तो फेरी वाले लेके आते थे या मंगरहिया और सनिचरहिया (मंगलवार और शनिवार को लगने वाली) बाजार में मिलती थी। मम्मी एक ही बिंदी तब तक लगाती थीं जब तक वो माथे पे चिपक सके फिर पत्ते से नयी बिंदी निकलती थी और ऐसे ही जब पत्ता खाली होजाता था तो नया आता था। पर जब तक नया नहीं आएगा क्या माँ का माथा सूना रहेगा? मैं लासा खोजने निकल गया ताकि बिंदी चिपक सके।

घर से थोड़ी ही दूर पे एक आरा मिल थी जहाँ लकड़ियों की चिराई होती थी। वहां पे हमेशा आम, महुआ आदि के बड़े बड़े बोटे रखे रहते थे जो चिराने के लिए आते थे, मुझे उम्मीद थी की लासा वहां जरूर मिल जाएगा। सड़क के किनारे आम के पेड़ के नीचे से कुछ पत्ते उठा लिए, आरा मिल पंहुचा तो वहां बोटे तो बहुत सारे थे पर कोई आदमी दिखाई नहीं दिया, अब पूछूँ किससे? पता चला बाद में पैसे मांगने लगे तो क्या करूँगा? थोड़ी देर अगोरने (इंतज़ार) के बाद भी जब कोई नहीं आया तो भगवान का नाम लेके काम शुरू किये। महुआ के एक खूब बड़े से तने पर चढ़ने लगा और इत्तेफाक से पहले ही प्रयास में सफलता मिल गयी। कोहनी थोड़ा जरूर छिला गया मोटी खाल से रगड़ के लेकिन लासा मिल गया। आम के पत्तों पे लासा इकठ्ठा किया और लेके घर  निकल दिया।
माँ ने सारा लासा सफाई  से निकाल के दीवार पे ऊपर एक जगह चिपका दिया, थोड़ा सा लाल रंग की बिंदी पे लगाके माथे पे लगाया और फिरसे सरसो फटकने बैठ गयीं। वो मुस्कुरा रही थीं, मैं खुश था।



टिप्पणियाँ

  1. वाह दीपक.... मुझे 'ईदगाह' के बच्चे 'हमीद' की झलक दिख रही थी …एक अरसा हुआ हिंदी में कुछ पढ़े हुए। … बहुत खूब

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  3. अच्छा लगा। बिल्कुल देशज शैली। बेहतरीन।

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